Why should food with colouring be avoided for children with ADHD?

एडीएचडीसे पीड़ित बच्चों को रंग मिलाए गए खाद्य पदार्थ क्यों नहीं देने चाहिए?

अगर आपके घर में अटेंशन डेफिसिट हाइपरएक्टिविटी डिसऑर्डर (एडीएचडी) से पीड़ित बच्चा है, तो आपको चमकदार और रंगीन पैक वाले खाद्य पदार्थों पर ख़ास ध्यान देना होगा। हालाँकि ज़्यादातर खाने में मिलाने वाला रंग या कलरिंग एजेंट को थोड़ी मात्रा में खाया जाए तो, वे हानिकारक नहीं होते हैं, लेकिन कुछ ऐसे पदार्थ भी हैं जो आपके एडीएचडी से पीड़ित बच्चे बच्चे के व्यवहार में बदलाव ला सकते हैं। कुछ अध्ययन तो ये भी बताते हैं कि खाने में मिलाए जाने वाले रंगों और व्यवहार में बदलाव आपस में जुड़े हुए हैं। चलिए, इसके बारे में ज़्यादा अच्छे तरीके से जानते हैं।

एडीएचडी क्या है?

एडीएचडी एक चिकित्सा स्थिति को दर्शाता है जिसमें इंसान के दिमागी विकास और दिमागी गतिविधि में फर्क होता है जिस कारण से उनके किसी चीज़ पर ध्यान देने, स्थिर बैठने और खुद पर नियंत्रण की क्षमता पर असर पड़ता है। इस स्थिति वाले बच्चे स्कूल में अपने आप को सही तरीके से एडजस्ट नहीं कर पाते हैं और उन्हें बहुत परेशानी का सामना करना पड़ता है। एडीएचडी से पीड़ित बच्चों का ध्यान आसानी से भटक जाता है, वे भुलक्कड़, बहुत ज़्यादा सक्रिय होते हैं और उन्हें बहुत आसान काम पर ध्यान देने में भी बहुत मुश्किल होती है। हम जो भी खाना खाते हैं उसका सीधा असर हमारे दिमाग पर पड़ता है, इसलिए शोधकर्ता यह सुझाव देते हैं कि हमारे भोजन का प्रकार और प्रकृति, एडीएचडी को नियंत्रित करने में मदद कर सकते हैं। इसलिए, एडीएचडी विशेषज्ञ हमें सभी ज़रूरी पोषक तत्वों को अपनी डाइट में शामिल करने, कुछ पोषक तत्वों को सप्लीमेंट के तौर पर लेने और कुछ को अपनी डाइट से हटाने की सलाह देते हैं। भोजन में शामिल किए जाने वाले कुछ कारक, खासतौर पर खाद्य पदार्थों में इस्तेमाल किए जाने वाले रंगों को एडीएचडी पीड़ित बच्चे की डाइट से हटा देना चाहिए।

क्या खाद्य पदार्थों में इस्तेमाल किए जाने वाले सभी रंग एक जैसे होते हैं?

खाद्य पदार्थों में इस्तेमाल किए जाने वाले रंगों को प्राकृतिक और सिंथेटिक श्रेणी में बाँटा जा सकता है । उदाहरण के लिए, 5 नंबर का पीला रंग और 6 नंबर का पीला रंग, खाद्य पदार्थों में इस्तेमाल किए जाने वाले कृत्रिम रंग है। हालाँकि, पौधों, मिनरल और जानवरों से मिलने वाले प्राकृतिक रंगों जैसे कि हल्दी, पीली शिमला मिर्च, और एन्नाट्टो आदि का इस्तेमाल करके भी खाद्य पदार्थों को पीले रंग में रंगा जा सकता है। भोजन में सिंथेटिक रंग मिलाने की वजह से ही एडीएचडी पीड़ित व्यक्ति के ज़्यादा सक्रिय होने की संभावनाएं बढ़ जाती हैं। यह समझना बहुत ज़रूरी है कि भोजन का रंग एडीएचडी की समस्या बढ़ा सकता है क्योंकि बच्चों के खाद्य पदार्थ ज्यादातर रंगीन होते हैं, और इस वजह से इसमें बहुत सारे कलरिंग एजेंट मिलाए जाते हैं। खाद्य पदार्थों में मिलाए जाने वाले कृत्रिम रंगों में से पीला और लाल रंग ज़्यादातर खतरनाक माना जाता है।

खाद्य पदार्थों में मिलाए जाने वाले रंग और व्यवहार से जुड़ी समस्याओं पर अध्ययन

एक रिपोर्ट में यह बताया गया था कि खाद्य पदार्थों में मिलाए जाने वाले रंगों से एडीएचडी से पीड़ित बच्चों में अति-सक्रियता बढ़ जाती है और यह सबसे पहले सन 1970 में बहुत लोकप्रिय हुआ था। तब बाल रोग विशेषज्ञ बेंजामिन फिनगोल्ड ने अतिसक्रिय व्यवहार और कृत्रिम रंगों के बीच संबंध की एक रिपोर्ट प्रकाशित की थी।

2007 में, यूनाइटेड किंगडम की फूड स्टैंडर्ड एजेंसी द्वारा, भोजन के कृत्रिम रंगों और बचपन के व्यवहार की समस्याओं के बीच संबंध को समझने के लिए एक अध्ययन किया गया था। इस अध्ययन में लगभग 300 स्टूडेंट शामिल हुए थे। बच्चों को तीन ग्रुप में बाँटा गया। दो ग्रुपों को तरह-तरह के कृत्रिम रंगों वाले पेय पदार्थ दिए गए और एक ग्रुप को प्लेसबो (एक ऐसा पदार्थ जिसका कोई प्रभाव नहीं है) दिया गया। पहले दो ग्रुपों के बच्चों का व्यवहार जल्दी ही अतिसक्रिय हो गया था।

दूसरी तरफ, मार्च 2011 में, फूड एंड ड्रग एडमिनिस्ट्रेशन (एफडीए) पैनल द्वारा एक खाद्य सलाहकार समिति का गठन किया गया जिन्हें अति-सक्रियता और कृत्रिम रंगों के बीच वैज्ञानिक प्रमाण की समीक्षा करने का काम दिया गया। उन्होनें पाया कि खाद्य पदार्थों के कृत्रिम रंगों के कारण अति-सक्रियता की समस्या वाली बात को सही साबित करने के लिए पर्याप्त प्रमाण उपलब्ध नहीं है।

इसलिए, कई सालों से परिणाम एक से नहीं रहे हैं, लेकिन हाल ही के कुछ सालों में कृत्रिम रंगों और एडीएचडी लक्षणों के ख़राब होने के बीच संबंध सामने आए  हैं। इस बात को ध्यान में रखते हुए, 2018 में, अमेरिकन अकेडमी ऑफ़ पीडियाट्रिक्स ने यह सुझाव दिया कि बच्चों की डाइट से खाद्य पदार्थों में इस्तेमाल किए जाने वाले सिंथेटिक रंगों और प्रिज़र्वेटिव हटाने से एडीएचडी के लक्षणों में कमी आ सकती है।

खाद्य पदार्थों में रंगों का इस्तेमाल करने से जुड़े कुछ नियम

पैक किए गए खाद्य पदार्थों में फ़ूड कलरिंग के लिए सभी देशों में अलग-अलग नीति और कानून हैं। भारत में, फ़ूड कलरिंग के लिए भारतीय खाद्य सुरक्षा और मानक प्राधिकरण (एफएसएसएआई) अधिनियम के तहत कुछ विशेष प्राकृतिक और कृत्रिम रूप से बनाए गए रंगों के इस्तेमाल की अनुमति है। अंतिम उत्पाद (खाद्य या पेय पदार्थ) में सिंथेटिक रंगों का इस्तेमाल प्रति मिलियन 100 भागों तक सीमित है। कभी-कभी अंतिम उत्पाद (खाद्य या पेय पदार्थ) में यह मात्रा प्रति मिलियन 200 भागों तक भी जा सकती है। इस्तेमाल किए गए रंगों की मात्रा को लेबल पर लिखना ज़रूरी होता है। एफएसएसएआई द्वारा अनुमति दिए गए कुछ सिंथेटिक रंग हैं :

  • पौनसोह 4आर  रेड
  • कारमोइसिन रेड
  • एरीथ्रोसिन रेड
  • टारट्राज़िन येलो
  • सनसेट येलो एफसीएफ
  • इंडिगो कारमिन
  • ब्रिलिएंट ब्लू एफसीएफ
  • फ़ास्ट ग्रीन एफसीएफ

हालाँकि, एफएसएसएआई या किसी भी मेडिकल एसोसिएशन द्वारा एडीएचडी के लिए कोई विशेष सलाह नहीं दी गयी। इसके अभाव में, अगर बच्चों के लिए मददगार साबित हो, तो बच्चों की डाइट से रंग वाले खाद्य पदार्थ या रंग हटाने के लिए दुनिया में माने जा रहे निर्देशों का पालन किया जाना एक समझदारी वाला फैसला है।

मात-पिता के तौर पर आप क्या कर सकते हैं?

बच्चों की अच्छी वृद्धि और सेहतमंद विकास के लिए कार्बोहाइड्रेट, प्रोटीन, विटामिन, मिनरल, और फैट  से भरपूर संतुलित डाइट की ज़रूरत होती है। दिमाग के लिए अच्छे खाद्य पदार्थों को शामिल करने से एडीएचडी लक्षणों को कम करने में मदद मिल सकती है। बच्चों को सुबह नाश्ते में ढोकला, इडली, डोसा जैसे दाल से बनाए जाने वाले खाद्य पदार्थ, अंडे, नट्स, पनीर, आदि जैसे प्रोटीन से भरपूर चीजें देने से उन्हें स्कूल में पढाई पर ध्यान लगाने में मदद मिल सकती है। शाम को उन्हें शुगर वाले खाद्य पदार्थों (जैसे कैंडी, चॉकलेट, मिठाई) देने से परहेज करना चाहिए और ज़्यादा से ज़्यादा मात्रा में कॉम्प्लेक्स  कार्बोहाइड्रेट (संतरे, सेब और दूसरे फल) खिलाने चाहिए क्योंकि ऐसा करने उन्हें रात में अच्छी नींद आने में मदद मिलती है। अपने बच्चे को अखरोट, चिया सीड्स और मछली जैसे ओमेगा 3 से भरपूर खाद्य पदार्थ देने की कोशिश करें। सबसे आखिर में लेकिन सबसे ज़रूरी बात यह है कि बच्चों को आकर्षक रंगों वाले खाद्य पदार्थ जैसे कि कपकेक, कैंडी और जेली देने से बचना चाहिए।

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